कभी कभी मैं सोचता हूँ,
हम दुनिया में क्यों आये
अपने साथ ऐसा क्या लाये,
जिसके लिए घुंट घुंट कर जीते हैं
दिन रात कड़वा घूँट पीते हैं,
क्या दुनिया में आना जरूरी है अगर है
तो फिर ज़िन्दगी क्यों अधूरी है.
कभी कभी मैं सोचता हूँ,
हम सपने क्यों देखते हैं,
सपनों से हमारा क्या रिश्ता है
जिन्हें देख आदमी अन्दर अन्दर पिसता है,
क्या सपने देखना जरूरी है,अगर है,
तो फिर ज़िन्दगी क्यों अधूरी है.
कभी कभी मैं सोचता हूँ,
बच्चे क्यों पैदा किये जाते हैं
पैदा करते ही क्यों छोड़ दिए जाते हैं,
माँ बाप का प्यार बच्चों को क्यों नहीं मिलता
क्या पैदा होना ज़रूरी है, अगर है
तो फिर ज़िन्दगी क्यों अधूरी है.